रोना भी ज़रूरी हैं..!

अंग्रेजी में फीलिंग्स…हिंदी में भावना और उर्दू में अहसास..

हर ज़िंदा इंसान के भीतर अहसास ही ये अहसास दिलाता हैं कि वो ज़िंदा है। ज़रूरी हैं कि खुलकर मुस्कुराया जाए… खिलखिलाकर हंसा जाए..कभी-कभी थोड़ा डरा जाए..उदास भी हुआ जाए…गुस्सा हुआ जाए.. वक़्त आने पर रोया जाए.. मगर अंदर मौजूद हर अहसास को जिया जाए..! क्या कभी यूँ ही बैठे-बैठे आंखे नहीं भर आती… अपने आप दिल नहीं उदास हो जाता…कभी खुश होते हैं मगर वजह ही पता नहीं होती। होता हैं अक्सर ही होता हैं सभी के साथ होता हैं।

डर सभी को लगता हैं..कभी तन्हा हो जाने का डर, कभी अंजान रास्तों का डर, कभी आने वाले कल का डर तो कभी किसी के बिना जीने का डर। वैसे ही प्यार का अहसास भी हर दिल में होता हैं कुछ इसे तवज्जो देते हैं तो कुछ यूं ही नजरअंदाज कर देते हैं मगर अहसास हर शख्स में होता हैं। जब हम प्यार में होते हैं न तो सबकुछ ही कितना खास हो जाता हैं। हर जगह वहीं शख्स, हर चेहरे में वही चेहरा, उससे जुड़ी हर छोटी-बड़ी बात से खुद को जोड़ लेना। उन्हें खोने का डर का ख्याल ही मानो आंखे भर देता हैं। मात्र ऐसी कल्पना कर लेना ही दिल पर खंजर का काम करता हैं। दूसरों के दर्द को अपना मान कर उसे महसूस करना।

अक्सर ही दूसरों की बिछड़ती मोहब्बत या यूँही कोई गाना आंखे नम कर देता हैं मगर कितना अजीब हैं न कुछ लोग यहां पत्थर से भी होते हैं जिन्हें कोई भावनात्मक जुड़ाव नहीं होता, किसी का होना न होना मायने नहीं रखता, जिन्हें खुद से खुद की पसन्द से मोहब्बत होती हैं बस। कहने को उनका आपके प्रति लगाव इतना होता हैं कि वो आपको तो ये अहसास कराएंगे कि आप कितने खास हो मगर खुद के सारे अहसास को न जाने कहाँ दफन रखते हैं। “यार मैं हूँ ऐसा मैं नही रोता..क्या करूँ बचपन में पापा मारते थे मैं झूठ में रोता मेरे आँसू नहीं निकलते” ये बातें कितनी अजीब हैं कि आज के दौर में जहाँ हर दूसरा बन्दा डिप्रेस्ड बैठा हैं वहीं कुछ लोग रोते ही नहीं…! आखिर क्यों लोग अपने जज़्बात को “हमे फर्क नहीं पड़ता” यह कहकर नकार देते हैं वो खुद के साथ धोखा करते हैं। हर इंसान एक जैसा हैं, रिश्ते वही, प्यार वही, दर्द वहीं, जज़्बात वही, फिर अहसास भी तो एक जैसे होंगे तो जब हम तन्हा किसी बात को दिल पर लेके आंखों से उस तकलीफ को आंसुओं के साथ बह जाने देते हैं तो क्यों कुछ लोग इन्हें अंदर तूफान बनाकर रखते हैं। ऐसा नही ही हो सकता कि कोई कुछ भी महसूस ही न करें क्योंकि ये नामुमकिन हैं तो फिर छुपाना क्यों? किससे खुद को और खुद के जज़्बातों से बचाकर रखना चाहते हैं ये लोग। खुद को पहले ही दिशानिर्देश देना कि कुछ महसूस होने से पहले ही ये महसूस हो जाए कि हमे तो कुछ महसूस ही नही होता ये गलत हैं। बह जाने दो कभी खुद को इन जज़्बातों के साथ आंसू बनकर…जिसतरह घर की सफाई ज़रूरी होती हैं वैसे ही दिल की भी तो क्यों इनमें नकारात्मक बातों को भरे रखना…अहसासों को जितना बंधक बनाकर रखेगे उतना ही अहसास आपको …तो खुलकर लोगों के साथ मन साझा करें..खुश रहे…रोये मगर अंदर किसी नकारात्मकता से भरे तूफान को जन्म न लेने दें।

पाखंड की सीमा…

हर सुबह आंख खुलते ही सर्वप्रथम आंखे अखबार ढूंढने लगती हैं। हर रोज़ पहले अखबार के दर्शन फिर कहीं दुनिया के…उसदिन भी मैंने अखबार उठाया “अरे आज शुक्रवार हैं मैगज़ीन भी आई होगी देखे तो ज़रा”….यही सोचकर मैने अखबार खोला, मैगज़ीन निकाली औऱ पढ़ना शुरू किया। उसदिन मैगज़ीन की कवर स्टोरी थी “वास्तविक सुंदरता”..टॉपिक तो बहुत अच्छा था। बनावट से भरी दुनिया मे आजकल सादगी की कदर करता ही कौन हैं। चलिये कुछ पत्रकारों को इसपर लिखने की आवश्यकता तो महसूस हुई। मैंने पढ़ना शुरू किया.. सारा का सारा ज्ञान मानों उन दो पन्नों में उड़ेल दिया गया हो…”बाहरी सुंदरता का कोई अस्तित्व नहीं आंतरिक सुंदरता ही सर्वोच्च है…खुद की दूसरों से तुलना न करें….आपका रंग-शारीरिक बनावट जैसा भी हैं उसका सम्मान करते हुए अपनाएं”… प्रियंका चोपड़ा, कल्कि कोचलिन, भारती सिंह जैसे तमाम सितारों के उदाहरण प्रस्तुत करके अपनी बात पर कुछ इस प्रकार बल दिया गया था कि पढ़ने वाली हर महिला इससे खुद को जोड़कर देखने लगी होगी। मैं स्वयं महसूस करने लगी सारी बातें मानो मेरे खातिर लिखी गयी हो। “आपके चेहरे का रंग उतना मायने नहीं रखता जितना आपका खूबसूरत दिल”…आहहा…क्या बात है… ऐसे तमाम कोटेशन थे जिन्हें पढ़कर लग रहा था मानो आज ही दुनिया सुधर जाएगी…लोग बदसूरती को कोसना बंद कर देगें… वाह वाह इससे पहले क्यों नहीं लिखा ऐसा किसी ने..दिल लालायित हो उठा।

मैंने वो पूरा आर्टिकल पढ़ डाला और पन्ना पलटा…फिर जानते हैं मेरे सामने क्या था..दूसरा आर्टिकल जिसका टॉपिक था कि खूबसूरत कैसे दिखे..? जी सही पढा आपने.. मतलब हद हैं पाखण्ड की…इतनी देर से सादगी पर ज्ञान देने के बाद वहीं लोग हमें खूबसूरत कैसे दिखे और खूबसूरत दिखना क्यों जरूरी हैं ये पाठ पढ़ा रहे..! आर्टिकल की शुरुआत की वो प्रथम पंक्तियों को तो मैं जीवन पर्यत्न भूल नहीं सकती कि “आजकल हर आंखे खूबसूरत चेहरे ढूंढती हैं तो आप भी खुद को ऐसा बनाये कि हर आंख आप पे आ रुके” बस मेरा लालयित ह्रदय गुस्से और घिन से भर गया और एक बात समझ आ गयी कि हर चीज़ आज मार्केटिंग का हिस्सा हैं। ये जो ज्ञान की बातें आप हर रोज़ पढ़ते-सुनते हैं उनपर यकीन पुख़्ता करने से पहले उन लोगों को भी जान लें जो ये ज्ञान बांटते फिर रहे हैं..!

क्योंकि आजकल ज़हर भी मिठाई के डिब्बों में बेची जा रही हैं. ज़िम्मेदारी आपकी हैं कि जीभ को काबू में करें दिल को सम्भाले और दिमाग से काम लें।

दिल्ली के दिल में ‘आप’

राजधानी में महीनों से बिछी चुनावी बिसात अब खत्म होने ही वाली हैं। हज़ार वायदों,रणनीतियों, और एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप के बीच दिल्लीवासियों ने उतनी दिलचस्पी चुनाव में उतनी नही दिखाई जितनी कि राजनीतिक दलों और मीडिया ने दिखाई। 2015 के विधानसभा चुनाव से इसबार 5 % कम मात्र 62.59% वोट पड़े हैं जो कि लोकतंत्र के लिये कोई शुभ संकेत नहीं हैं। चुनाव खत्म होने के साथ ही जारी हुये मीडिया के एग्जिट पोल में आम आदमी पार्टी की सरकार भारी मतों से दोबारा सत्ता पर काबिज होती नज़र आ रही हैं। दूसरी बड़ी पार्टी बनकर भाजपा फिर एक बार अपना कमल खिला रही हैं। जबकी कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला। पिछले वोट प्रतिशत से कांग्रेस अबतक के सबसे निचले ग्राफ पर आ गयी हैं। मगर फिर भी एक्जिट पोल के नतीजों के बाद कोई कांग्रेसी सामने आकर हर बार की तरह इसबार इल्ज़ाम नही लगा रहा यह आश्चर्यजनक हैं। मगर आम आदमी पार्टी के संजय सिंह कहाँ पीछे रहने वाले है। ईवीएम को लेकर एक वीडियो और अपने वही पुराने हैकिंग के दावों के साथ एक बार फिर वो मैदान में उतरे नज़र आ ही गये। अपने तमाम दावों को सही साबित करने के बीच उन्होंने चुनाव आयोग को भी नही बक्शा। चुनाव आयोग पर आप ने आरोप लगाया कि चुनाव प्रकिया पूरी होने के एक दिन बाद तक आंकड़े क्यों नही पेश किये जा सकें?…जिसपे चुनाव आयोग में अपनी सफाई देते हुए स्पष्ट कहा कि कई इलाकों में देर रात तक वोटिंग होने के कारण यह देरी हुई हैं साथ ही ईवीएम के सवाल पर उन्होंने कहा कि वीडियो में जो ईवीएम दिख रही वो रिज़र्व यानी कि इस्तेमाल नही हुई हैं। मगर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी के अति आत्मविश्वास के आगे ‘आप’ लड़खड़ाती दिख रही हैं तभी बार बार वो ऐसे आरोप लगा कर अपनी जीत को संदेह में डाल रही हैं। ख़ैर अब जब मैं ये ब्लॉग लिख रही हूँ उसी के कुछ घण्टों के बाद दिल्ली के भविष्य का ऐलान हो जाएगा और दिल्ली एक बार फिर झाड़ू के साये तले दिल्ली में दुर्व्यवस्थाओं की सफाई में मग्न होगी.. दिल्ली की सत्ता पर कमल खिलना कुछ मुश्किल हैं..क्योंकि अबकी झाड़ू ने कीचड़ का सफाया कर दिया हैं..!

आप की इस जीत से बेशक शाहीनबाग मे धरना कर रहे लोग बेहद खुश होंगे क्योंकि आखिर वो सरकार वापस आ रही हैं जिसे खुद धरने देने में मज़ा आता है खैर एक आखिरी बात उत्तर प्रदेश को लेकर 2017 के विधानसभा चुनाव में एक बात काफी ज़ोरो-शोरों से की जा रही थी कि यूपी वाले कुछ अनपढ़ लोग धर्म के नाम पर वोट देते हैं । आज मुझे ये सोचकर हँसी आ रही हैं कि चलो दिल्ली के पढ़े-लिखे फ्री के नाम पर वोट देकर आये.

दिल्ली वालों को पुरानी सरकार नए रूप में मुबारक हो..यूँही मुफ्त सेवा जारी रहे..!

सभ्यता सिर्फ किताबों में….

मैं मॉल गयी हुई थी। हमेशा की तरह आज भी मेरी आँखें स्थिर नही थी हर ओर मेरी नज़रें दौड़ रही थी। कभी सजावटों को देखती तो कभी लोगों की लाइफस्टाइल, कभी उनके रिश्ते, तो कभी उनके चेहरों को पढ़ने की कोशिश करती। अकेले बैठकर जब कुछ नही करना होता हैं तो मैं यही करती हूं और इसमें मुझे एक अलग सा सुकून मिलता हैं। मॉल की सजावट मोहब्बत के इन 7 विशेष दिनों को ध्यान में रखके हुई थी…बेहद दिलकश। वैलेंटाइन वीक में प्यार के धुन की गूंज…खूबसूरत और चिकने मेकअप से लदे चेहरे…हर ओर खटकती हील…महंगे सेंट से महकती फ़िज़ा…! आंखे जहां जाती वहां लगता मानो अम्बानी के भांजे-भतीजे आ पहुँचे हो। चेहरों पर अमीरी की रौनक यूँ दमकती जैसे अंधेरे में रखा रेडियम।

मैं लोगों को ध्यान से देख रही थी और कहानी ढूंढ रही थी। हर चेहरा तो एक किताब था जिनमें हज़ार बातें नज़र आ रही थी मगर अचानक उन मेकअप से दमकते चेहरों के बीच में से एक वास्तविक सौंदर्य की प्रतिमूर्ति से बच्ची निकल कर सामने आई। गंदी सी फ़टी फ़्रॉक पहने जो न जाने कितनी बार सिली उधड़ी थी, उलझे से बाल, पैरों में मामूली सी चप्पल मगर चेहरे पर भारी आत्मविश्वास लिए वो चली आ रही थी। एक पॉश इलाके के महंगे मॉल में लोगों के बीच बेधड़क बढ़ती चली आ रही थी जैसे कांटो के बीच खिलता हुआ गुलाब। मैं उसके पीछे चल पड़ी। लोग उसे मुड़-मुड़ कर देख रहे थे मगर उसे जैसे किसी की परवाह थी ही नहीं..वो अपनी ही मस्ती में चली जा रही थी। तभी मेरी नज़र उसकी बंद मुठ्ठी पर गई। तभी वो चलते-चलते थम गई। उसके सामने एक्सलरेटर था…हिचकिचाहट के साथ लड़खड़ाती हुई उसने कदम आगे बढ़ाया। मैं उसके पीछे थी। वो नज़रे दौड़ाती हुई सबकुछ मानो अपने आंखों में भर लेना चाहती थी। कभी खाली कुर्सियों पर बैठकर आने जाने वालों को देखती, कभी एक्वेरियम में मछलियों को मुँह चिढ़ाती।

काफी देर वो यूँही टहलती रही फिर आगे बढ़ी। मैं अभी भी उसके पीछे चल रही थी। वो तभी एक खिलौने की शॉप में चली गयी। उसकी आंखें और चेहरे की वो मुस्कान इस वक़्त शायद दुनिया की सबसे खूबसूरत मुस्कान थी उसने एक टेडीबियर को उठाया और उसे देखने लगी । मैं उन लम्हों को कैमरे में कैद कर ही रही थी कि सेल्समैन उसपर झपट पड़ा। उसपर चिल्लाते हुए बोला क्या क्या चुरा रही हो? इसे अंदर किसने आने दिया? सिक्योरिटी…। उस बच्ची की मुस्कान ख़ौफ़ में बदल गई। उसकी आवाज़ मानो गुम सी हो गई। सहमी सी वो बोली चोर नहीं हूं मैं…तभी सेल्समैन ने उसको घसीटते हुए काउंटर से बाहर कर दिया। वो मासूम डरी-सहमी सी बस एक ही बात कह रही थी…चोर नहीं हूँ अंकल…चोर नहीं हूँ..! तभी सिक्योरिटी गार्ड ने उसके हाथों को बेरहमी से मरोड़ते हुए गेट से बाहर धकेल दिया। इन भिखारियों को मॉल में घुसने कौन देता हैं…ऐसी तमाम बातें मेरी कानों में पड़ी। मैं जब बाहर आई तो वो बच्ची आंखों में गुस्से का गुबार जो आँसू बन उसकी आँखों मे भरा हुआ था उसे सम्भाले खड़ी थी..एकदम अवाक सी..! तभी उसने अपनी बंद मुठ्ठी खोली जिसे देख मैं हैरान रह गयी। उसकी मुट्ठी में पैसे थे..जिन्हें शायद वो कुछ खरीदने के लिये लायी थी मगर हमारे कथित सभ्य-समाज उसके फटे कपड़ों से आगे जा ही नहीं पाया। फ़टे-पुराने कपड़े वाले ये भिखारी से बच्चें चोर ही तो होते हैं…? इन्हें दूर रखकर ही तो हम एक बेहतर समाज और देश का निर्माण कर सकते हैं…! मैं ये सोच ही रही थी कि वो बच्ची न जाने कहाँ चली गयी…शायद दूर चली गयी थी इस झूठी शान-ओ-शौक़त और सभ्यता की बेड़ियों को तोड़ते हुए..!

शाहीनबाग: नाटक की हद

50 से ज्यादा दिन गुज़र गये, गोलियां भी चल गई, एक 4 महीने की मासूम की मौत भी हो गई… मगर शाहीनबाग अब भी नागरिकता कानून के खिलाफ आग में जल रहा हैं…! या यूं कहें कि प्रदर्शन के नाम पर वामपंथ अपना शक्ति प्रदर्शन कर रहा हैं। सड़कों पर औरतें बैठाई गयी हैं बच्चें यूँ ही स्कूल से जान छुड़ाकर या जबर्दस्ती यही कहीं घूमते नजर आ जाते हैं। यह बिल्कुल उन इतिहास के पन्नों की याद दिला देता हैं जब बादशाह राजा से युद्ध के समय मैदान में गायों को आगे कर दिया करते थे..

भारत के नक्शे के ज़रिये हो रहा विरोध

खैर बीती बातों पर न जाते हुए वर्तमान की बात करते हैं.. लोग यहां आते हैं..बैठते हैं.. भड़काऊ भाषण सुनते हैं.. घूमते-फिरते हैं..बिरयानी खाते हैं.. और भीड़ बढाकर निकल जाते हैं..मैं यह नहीं कह सकती कि उन्हें इसके पैसे भी मिलते हैं…पता नहीं…मगर कल फिर आ जाते हैं और यही क्रम 50 दिनों से शाहीनबाग में चल भी रहा हैं… जी..यहीं चल रहा हैं। यदि आपको लगता हैं कि वहां वास्तव में मुस्लिम महिलाएं संविधान बचाने को बैठी हैं…सिख भाई इनका साथ देने को खड़े है..हिन्दू आदमी-औरतें यहां यज्ञ कर नागरिकता कानून का विरोध कर रहे हैं तो यह आपकी सबसे बड़ी भूल हैं क्योंकि यहां कोई संविधान के लिये नहीं आया इन्हें तो संविधान का ‘स’ भी नहीं पता होगा..जो महिलाएं 3 तलाक़ से खुद को कभी नहीं बचा सकी यहां तक कि बिना सरकार के कहे आवाज़ तक नहीं उठा सकी वो आज संविधान और लोकतंत्र बचाने निकली हैं यह बेहद हास्यास्पद हैं।

हां शुरुआती दिनों में यह प्रदर्शन वास्तव में प्रदर्शन था मगर धीरे-धीरे इसे राजनीतिक एजेंडे में तब्दील कर ऐसी आग लगाई गई जहां सभी अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने पहुँचने लगे। कोई भी आ जाता हैं माइक के सामने ज़हर उगलता हैं और बच्चें तालियां पीटते हैं…और जब इन बच्चों को माइक दी जाती हैं तो अपने बचपने को किनारे करते हुए रटी-रटाई बातों को दोहराते हैं…मरने -मारने की बातें करते हैं..! इन औरतों से बात कीजिये बस एक ही बात ‘सरकार CAA वापस ले ले हम हट जायेगे’ मगर वो ये नहीं बताती कि CAA से उन्हें क्या तकलीफ हैं क्या उनके रसोई के दाम बढेंगे? उनके बच्चों की फीस बढ़ेगी? या फिर उन्हें इस देश से बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा? कुछ नहीं होगा बल्कि उनका तो इससे कोई सम्बंध ही नहीं हैं मगर फिर भी ये विरोध कर रहे हैं…जो कि बीते कुछ मसलों पर उनकी खिसियाहट को बयां करता हैं।

जिसतरह वे कथित अल्पसंख्यक बनकर सदैव खुद को पीड़ित बताते रहे वैसे ही जब दूसरे मुल्क के अल्पसंख्यक समुदाय की बात आई , जब उनके जगजाहिर प्रताड़ना से उन्हें मुक्ति दिलाने की कोशिश हुई ..तब ये ही लोग पीछे हो गये..! इन्हें अनुच्छेद 14 याद आने लगा.. मगर ये भूल गये कि विशेष परिस्थितियों में किसी को भी लाभ दिया जा सकता हैं और अल्पसंख्यक समुदाय होने के नाते शाहीनबाग के पढ़े-लिखे लोगों को यह समझना चाहिए क्योंकि उन्हें भी तो आरक्षण जैसे तमाम सुविधाएं दी जाती हैं..उसका विरोध तो कोई भी नहीं करता…! फिर जान बचाकर यहां आए उन अल्पसंख्यक समुदायों को नागरिकता दिए जाने का ऐसा विरोध..? शर्मनाक उन सब के लिये जो गंगा-जमुनी तहज़ीब की बातें करते फिरते हैं…सेक्युलर-सेक्युलर की रट लगाए रहते हैं..और आज शरणार्थियों को घर दिए जाने का विरोध कर रहे हैं…सरकार का पक्ष की वो इस कानून से एक इंच पीछे नहीं हटेंगे..यह शाहीनबाग में धरने की आड़ में बैठे लोगों को अब समझ जाना चाहिए कि नाटक की भी समयसीमा होती हैं उसका भी अंत होता हैं तो इन्हें भी अब अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर काम-धंधे पर निकल जाना चाहिये।

तुम कश्मीरी’पंडित’ थे बस यही कुसूर था तुम्हारा

आंखों में वो मौत का मंजर लिए

खून से सने-मरणासन्न अपनो को लिए

छोड़कर अपनी सरज़मीं

वो आये थे मौत में ज़िंदगी ढूंढने के लिए…

जब उन सर्द आधी रातों को

फेंके गए पत्थर घरों पर

हर ओर कोहराम में बिलखते

वो खुशमिजाज शहरी बदहवास से मिले

टूटे खिड़कियों के कांच संग टूटे सपनो से

लुटी इज़्ज़त जान को बचाने के लिए

उस रात जब अपने पड़ोसी यार ही खून के प्यासे मिले…

लड़े वो उन ‘अपनो’ से

कोई ज़मीं छोड़ आया कोई जायदाद छोड़ आया

कोई अपनो को खो आया कोई अपनो की लाशें छोड़ आया

घर छोड़ा वादी छोड़ी

छोड़ दी सरकार से मदद की उम्मीद

कोई उस रोज पत्थरों से मरा, कोई गोली से मरा

मार गयी उस रोज हुकूमत की ज़मीर…

अपने मुल्क में शरणार्थी होने का ग़म उठाया

हर रोज अपने ही मुल्क में अपने ही अधिकारों को आवाज़ उठाया..

खामोश थी उस रोज हर वो जुबां

जो आज इंकलाब का नारा बुलंद करती हैं

इक हाथ नही बढ़ा था उस रोज

जो आज कश्मीर के दर्द की बातें करती हैं

कागजों में सिमटा रह गया था ‘धर्मनिरपेक्षता’ का नारा

तुम कश्मीरी “पंडित” थे न बस यही कुसूर था तुम्हारा…!

तो ये हैं हकीकत..?

जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष आइशी घोष ने शाहीन बाग में CAA के खिलाफ चल रहे धरने पर पहुँची और उसके बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया कॉलेज पहुँची। जहाँ उन्होंने आखिरकार अपने असल एजेंडे की पोल खोल ही दी। आइशी घोष इन दिनो काफी सेंसेशन बन चुकी हैं और आरएसएस और बीजेपी सरकार को प्रेस-कॉन्फ्रेंस कर कर के कोस रही हैं उन्होंने शाहीन बाग में भी वही किया जिसके लिये वो आज चर्चा का केंद्र बनी हुई हैं। जेएनयू के छात्रों द्वारा पिछले कई महीनों से चल रहे आंदोलन का कारण पूछने पर कभी बढ़ी फीस को बताया गया कभी CAA और NRC को बताया गया मगर अब आइशी घोष अपने भाषण में सत्य बोल ही गई। उन्होंने छात्रों को सम्बोधित करते हुए कहा कि “हम इस लड़ाई में कश्मीर को पीछे नहीं छोड़ सकते हैं। हमारे साथ जो हो रहा है, वो कहीं न कहीं सरकार ने वहीं से शुरू किया था कि हमारे संविधान को हमसे छीना जा रहा हैं।” कश्मीर को लेकर आइशी का यह बयान स्पष्ट करता हैं कि वो भी उसी बीमारी से पीड़ित हैं जो कश्मीर को भारत के अंग के रूप में नही बल्कि गुलाम के रूप में देखता हैं। केंद्र सरकार पर निशाना साधते-साधते आइशी का यह बयान उनके और उनके साथी प्रदर्शनकारियों की पोल खोलता हैं कि संविधान का नाम लेकर सिर्फ और सिर्फ एक खास सोच औऱ विचारधारा को बढ़ावा दिया जा रहा हैं जो की किसी भी तरह से देशहित में नही हैं।